रूठे हैं एहसास सपने आँखों में कैसे सजाऊँ
तुमको चाहूँ भी भुलाना तो बता कैसे भुलाऊँ
तेरी फ़ुर्क़त में ये दिल पत्थर का बनता जा रहा है
जीने की भी आरज़ू दिल में कहाँ से अब मैं लाऊँ
तेरी रुसवाई न हो इस डर से चुप बैठा हूँ अब तक
दिल का ऐसा दर्द है अरमान मैं कैसे छुपाऊँ
शक्ल चाँद-ओ-तारों में भी तेरी दिखती है मुझे तो
आँखों में जो चेहरा बसता है वो मैं कैसे हटाऊँ
ज़िंदा रहने की ही इक छोटी सी कोशिश करती हूँ मैं
यादों के इन सिलसिलों से कैसे बाहर अब मैं आऊँ