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ममता का आँचल

Parul Bhaktani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कितना सुकून था माँ जब सर पे तेरी ममता का आँचल था
        
                                                    
                            
बेफ़िक्र थे हर परेशानी से हम हर ग़म आँखों से ओझल था

तुम थी तो ज़माने की हर गर्दिश से महफूज़ रहते थे हम
तब मसर्रतों का सिलसिला ज़िंदगी में रहता मुसलसल था

मोअत्तर रहता था तुम्हारी ममता के फूलों से घर-आँगन
ज़िंदगी का हर दौर खुशनुमा और कितना मुकम्मल था

आज न तुम हो,न वो दौर है, ना ही वो सुकून का आँचल
लौट कर न आएंगे वो दिन क्योंकि वो बीता हुआ कल था

ख़्वाबों में आकर अपने आँचल में छुपा लेना 'पारुल' को
रूह में समाया रहता है जो वो तुम्हारे प्यार का संदल था
एक वर्ष पहले
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