कितना सुकून था माँ जब सर पे तेरी ममता का आँचल था
बेफ़िक्र थे हर परेशानी से हम हर ग़म आँखों से ओझल था
तुम थी तो ज़माने की हर गर्दिश से महफूज़ रहते थे हम
तब मसर्रतों का सिलसिला ज़िंदगी में रहता मुसलसल था
मोअत्तर रहता था तुम्हारी ममता के फूलों से घर-आँगन
ज़िंदगी का हर दौर खुशनुमा और कितना मुकम्मल था
आज न तुम हो,न वो दौर है, ना ही वो सुकून का आँचल
लौट कर न आएंगे वो दिन क्योंकि वो बीता हुआ कल था
ख़्वाबों में आकर अपने आँचल में छुपा लेना 'पारुल' को
रूह में समाया रहता है जो वो तुम्हारे प्यार का संदल था
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