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दिखावे के नाते

Parul Bhaktani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बिखरी ख़ामोशी के पीछे इक छुपा तूफ़ान है
        
                                                    
                            
खिलखिलाते होठों से खो सी गई मुस्कान है

नज़रों में रहता तसव्वुर सिर्फ उसका हर समय
ज़िंदगी उसके बिना जैसे बनी शमशान है

बोझ अपनी लाश का हम ख़ुद उठाए फिरते हैं
साँसे चाहे चल रही हैं जिस्म तो बेजान है

आलम-ए-तन्हाई से वहशत सी होने लगती है
गूँजते सन्नाटे हर-सू जैसे उस दौरान है

मेरे मालिक साँसों के इस बोझ से अब कर रिहा
बंदा ये इस ज़िंदगी से हो गया हैरान है

उन दिखावे के ही नातों को ही समझा मैंने सच
झूठ सच की अब नहीं कोई रही पहचान है
एक महीने पहले
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