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दिखावे के नाते

                
                                                         
                            बिखरी ख़ामोशी के पीछे इक छुपा तूफ़ान है
                                                                 
                            
खिलखिलाते होठों से खो सी गई मुस्कान है

नज़रों में रहता तसव्वुर सिर्फ उसका हर समय
ज़िंदगी उसके बिना जैसे बनी शमशान है

बोझ अपनी लाश का हम ख़ुद उठाए फिरते हैं
साँसे चाहे चल रही हैं जिस्म तो बेजान है

आलम-ए-तन्हाई से वहशत सी होने लगती है
गूँजते सन्नाटे हर-सू जैसे उस दौरान है

मेरे मालिक साँसों के इस बोझ से अब कर रिहा
बंदा ये इस ज़िंदगी से हो गया हैरान है

उन दिखावे के ही नातों को ही समझा मैंने सच
झूठ सच की अब नहीं कोई रही पहचान है
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56 मिनट पहले

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