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दहेज एक कुप्रथा

Paramveer singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मध्यम वर्ग का एक परिवार साधारण है जो घरबार
        
                                                    
                            
उसे घर में प्यारी बिटिया है आई, उसे घर में डॉन खुशियां है लाई
हस्ती खेलती बिटिया हुई बड़ी, आई बेटियों के विवाह की घड़ी, पिता ने ढूंढा संपन्न परिवार, लेकिन पिता पर पड़ी दहेज की मार, बिटिया को खुशी देनी चाहिए भरमार, पिता शहर गया कर्ज वह लाचारी की मार
कब तक रहेगा बिटिया का परिवार
दहेज के लालचियों ने किया आघात प्रहार
पिता बाई ने लगाई अपनी सारी कमाई लेकिन लालचियों की भूख कहां मिटती है भाई, दहेज के भुकों के आगे लालसा है छाई उनकी नजर तो है बहू पियर से क्या लाई
बिटिया जो अपने घर में प्यार से जूली वह आज सोना चांदी बर्तनों में तुली, फ्रिज कूलर टीवी और चारपाई यह सब देने में पिता की हड्डियां गल गई भाई
जैसे तैसे हुई बिटिया की विदाई, ससुराल में हुई और मांग भाई, बिटिया हुई टांग और परेशान, बिटिया ने सोचा पिता के लिए नहीं आसान
ससुराल वालों ने बिटिया को डराया धमकाया
लेकिन बेटी ने ना ऑफ किया और ना पिता को बताया
बीटीएस है गई सारी मार और करती भी क्या वह लाचार
पिता पहले ही कर्ज में डूबा भरपूर अगर बेटी करती मांग तो पूरा करता जरूर लेकिन बेटी ने ना पिता को बताया अपना अलग मार्ग है अपनाया
बेटी ने ली अपनी जान मृत्यु का बेटी ने किया पान
पिता का बिखरा संसार अमूल्य खाया इस बार
यहीं खत्म हुई पिता की मेहनत उन दहेज के दरिंदों पर है लानत बंद करो यह दहेज प्रथा यह बनेगी किसी दिन किसी और बेटी की मृत्यु कथा।
-निकिता कंवर चुंडावत
 
5 घंटे पहले
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