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मैं बाधित हूं

प्रभात सनातनी

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रचूं तो क्या रचूं, पर सच रचूं तो गाली मिलेगी,
        
                                                    
                            
किसी की वाहवाही करूं तो दिवाली मिलेगी।।
सच सुनकर,इंसानों की आंखों में लावा फूटता,
गरीबों की कौन सुनता जो हर पल है जूझता।।
पड़ोसियों की देन,आज बड़कू बहुत परेशान है,
जो करता दूसरों की चापलूसी वही तो इंसान है।।
पाटिल की भूमिका में हर कोई बनता यहां पर,
बुजुर्गों की बात को कौन समझता है यहां पर।।
मालिक का बच्चा आ दरवाजे पर खड़ा हुआ है,
तबीयत बहुत खराब है फिर भी जाना हुआ है।।
मुलायम गदेलियों पर बैठ मालिक चाय पी रहे हैं,
वो दोस्तों के साथ गरमाहट की चुस्कियां ले रहे हैं।।
अफसोस अपने भाग्य पर दुर्भाग्य मेरा हो गया है,
गुलामी करूंगा मालिक की ख्वाब मेरा हो गया है।।
घर चलाने के लिए मुझे उसका लात भी खाना पड़ा,
आधा देता काट लेता, सामने मुस्कुराना भी पड़ा।।
सोचता हूं जैसे कट रही है कुछ बोल भी पाता नहीं,
अपनों से भी हार जाता हूं उससे जीत भी पाता नहीं।।
-प्रभात सनातनी "राज" गोंडवी
 
8 महीने पहले
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