आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैं बाधित हूं

                
                                                         
                            रचूं तो क्या रचूं, पर सच रचूं तो गाली मिलेगी,
                                                                 
                            
किसी की वाहवाही करूं तो दिवाली मिलेगी।।
सच सुनकर,इंसानों की आंखों में लावा फूटता,
गरीबों की कौन सुनता जो हर पल है जूझता।।
पड़ोसियों की देन,आज बड़कू बहुत परेशान है,
जो करता दूसरों की चापलूसी वही तो इंसान है।।
पाटिल की भूमिका में हर कोई बनता यहां पर,
बुजुर्गों की बात को कौन समझता है यहां पर।।
मालिक का बच्चा आ दरवाजे पर खड़ा हुआ है,
तबीयत बहुत खराब है फिर भी जाना हुआ है।।
मुलायम गदेलियों पर बैठ मालिक चाय पी रहे हैं,
वो दोस्तों के साथ गरमाहट की चुस्कियां ले रहे हैं।।
अफसोस अपने भाग्य पर दुर्भाग्य मेरा हो गया है,
गुलामी करूंगा मालिक की ख्वाब मेरा हो गया है।।
घर चलाने के लिए मुझे उसका लात भी खाना पड़ा,
आधा देता काट लेता, सामने मुस्कुराना भी पड़ा।।
सोचता हूं जैसे कट रही है कुछ बोल भी पाता नहीं,
अपनों से भी हार जाता हूं उससे जीत भी पाता नहीं।।
-प्रभात सनातनी "राज" गोंडवी
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर