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"ज़ज़्बात......अनकहे से

Pankaj Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            काश......
        
                                                    
                            
गर्मियों की उन खामोश रातों में,
जब चाँद अपनी दूधिया रोशनी के ज़रिए एक सफेद मखमली बिछौना बिछाने की कोशिश में हुआ करता था,
उन्हीं चाँदनी रातों में खुले आसमान के नीचे,
छतों पर बैठकर, वो जो कुछ जज्बात पिरोए थे,
लफ़्ज़ों के खतनुमा उन हारों में, उनके ज़रिए,
सरेराह तुम्हारे आसपास से गुजरते वक्त,
तुम्हारी महक में मदहोश होकर,
हाँ, वो जो खिड़कियाँ थीं तुम्हारी,
जिनसे तुम्हारी गहरी नज़रें अक्सर मुझे देख लिया करतीं थीं,
बस ठीक उसी वक्त, तुम्हारी आँखों की उन गहराई में उतरकर,
यूँ तो नींद भी कमबख्त कम ही आया करती थी उन दिनों,
पर उन नींदों में देखे ख्वाबों में तुम्हारे हाथों को पकड़कर,
कई बार अपनी आँखों में तैरते नाज़ुक ज़ज़्बातों के ज़रिए,
तुम्हारी उन झुकी पलकों के नीचे ठहरकर,
कहीं कुछ था, जो कह देना चाहता था तुमसे,
काश तुमने सुन लिया होता वो सब....काश।।
......पंकज यादव, बदायूँ    


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