आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

"ज़ज़्बात......अनकहे से

                
                                                         
                            काश......
                                                                 
                            
गर्मियों की उन खामोश रातों में,
जब चाँद अपनी दूधिया रोशनी के ज़रिए एक सफेद मखमली बिछौना बिछाने की कोशिश में हुआ करता था,
उन्हीं चाँदनी रातों में खुले आसमान के नीचे,
छतों पर बैठकर, वो जो कुछ जज्बात पिरोए थे,
लफ़्ज़ों के खतनुमा उन हारों में, उनके ज़रिए,
सरेराह तुम्हारे आसपास से गुजरते वक्त,
तुम्हारी महक में मदहोश होकर,
हाँ, वो जो खिड़कियाँ थीं तुम्हारी,
जिनसे तुम्हारी गहरी नज़रें अक्सर मुझे देख लिया करतीं थीं,
बस ठीक उसी वक्त, तुम्हारी आँखों की उन गहराई में उतरकर,
यूँ तो नींद भी कमबख्त कम ही आया करती थी उन दिनों,
पर उन नींदों में देखे ख्वाबों में तुम्हारे हाथों को पकड़कर,
कई बार अपनी आँखों में तैरते नाज़ुक ज़ज़्बातों के ज़रिए,
तुम्हारी उन झुकी पलकों के नीचे ठहरकर,
कहीं कुछ था, जो कह देना चाहता था तुमसे,
काश तुमने सुन लिया होता वो सब....काश।।
......पंकज यादव, बदायूँ    


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
7 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर