मैं कोई सीमांकित भूखंड नहीं,
न रेखाओं का बंदी।
मैं वह आकाश हूँ
जहाँ दिशाएँ जन्मती हैं,
और स्वयं में लौट आती हैं।
मेरे एक छोर पर
परशुराम का अग्नि-संकल्प,
अन्याय पर तनी प्रत्यंचा।
दूसरे छोर पर
विश्वामित्र का निर्वाक् तप।
अग्नि और मौन—
दो विरोध नहीं।
एक बाहर जलाती है,
दूसरा भीतर गलाता है;
दोनों अहंकार हरते हैं।
जब बुद्धि
चाणक्य के व्यूह रचती है,
भीतर कहीं
नचिकेता अब भी
मृत्यु से प्रश्न करता है।
प्रश्न ही
मेरी सबसे पुरानी स्मृति है।
उत्तर बदलते रहते हैं,
किन्तु जिज्ञासा
कभी वृद्ध नहीं होती।
कुटिलता और सरलता—
दो पृथक् पथ नहीं।
मैं नदी का भँवर भी हूँ,
और वही जल
जब शांत हो जाता है।
समय पुकारे
तो कृष्ण का स्वर हूँ।
सत्य पुकारे
तो अर्जुन का
मौन श्रवण।
शब्द
अंतिम सत्य नहीं।
कई बार
मौन ही
सबसे अधिक बोलता है।
मेरी करुणा
आवश्यक होने पर
वज्र धारण करती है।
और मेरा कठोर निर्णय भी
एक कुसुम बचा लेता है।
क्षमा और दण्ड—
दो धर्म नहीं।
वृक्ष भी
सूखी डाल छोड़कर
नव-पल्लव रचता है।
मैं उतरता हूँ
संसार की लहरों में।
नाम, संबंध, इच्छाएँ—
सबको जीता हूँ,
सबको बहते देखता हूँ।
फिर एक क्षण
सब छूट जाता है।
जो अपना लगता था,
वह समय की धूल बन
उड़ जाता है।
आसक्ति और वैराग्य
दो अवस्थाएँ नहीं।
एक ही श्वास के
आगमन और निर्गमन हैं;
जीवन इन्हीं में संतुलित है।
अब जानता हूँ—
विरोध केवल
दृष्टि का भ्रम है।
अस्तित्व के भीतर
सब एक-दूसरे को पूर्ण करते हैं।
मैं विरोधों का योग नहीं,
उनसे पहले का मौन हूँ।
स्वयं को खोजते-खोजते
हर उत्तर से आगे।