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संभल ऐ राही, समय यही

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            काँच की चमक पर रीझकर,
        
                                                    
                            
दौड़ रहा है आज मानव।
भूल स्वयं की अस्मिता,
बनता जाता आभासी दानव।
दिखने की इस होड़ में,
सत्य कहीं अब छूट रहा।
क्षणिक प्रसिद्धि की चाह में,
जीवन भीतर टूट रहा।

सड़क हो या कोई मोड़,
भीड़ स्वयं में खोती है।
आत्ममुग्धता के अंधकूप में,
चेतना प्रतिपल सोती है।
लाइक्स की अंधी भूख ने,
मौन हृदय को हर लिया।
झूठी वाहवाही के बदले,
सत्य का स्वर मर लिया।

पास खड़े अपने भी अब,
कोसों जैसे दूर हुए।
कैमरों की कैद में आकर,
चेहरे सब मजबूर हुए।
रिश्तों का मधुर आलाप,
बाज़ारों में बिकने लगा।
दिखावे की तीखी धूप में,
विश्वास भी झुलसने लगा।

उत्सव जो थे प्रेम के,
प्रदर्शन का रूप हुए।
यश और क्षणिक वैभव में,
भाव सभी अब सुप्त हुए।
हर मुस्कान यह पूछ रही—
कितनों ने स्वीकार किया?
निर्मल मन के स्पर्श को,
तालियों ने हार दिया।

पश्चिम की तीखी आँधियों में,
संस्कार बहने लगे।
मूल्य और मर्यादा जैसे,
पाँव तले दबने लगे।
स्वीकृति की अंधी दौड़ ने,
स्वत्व सभी विस्मृत किए।
बाह्य चमक के मोह में,
अंतरदीप भी बुझ गए।

स्वयं को सिद्ध करने की,
यह कैसी प्रतिस्पर्धा है?
भीड़ की स्वीकृति पर ही,
क्यों जीवन की साधना है?
दर्पण लाखों सामने हों,
सत्य नहीं मिल पाएगा।
जो भीतर झाँक सकेगा,
वह स्वयं को पाएगा।

क्षणभंगुर इस उन्माद में,
मत बेचो निज सादगी।
यही विनाश की ढलान है,
यही मन की आवारगी।
लौट चलो उस पंथ पर,
जहाँ विवेक का धाम है।
भीतर के निस्तब्ध स्वर में,
जीवन का विश्राम है।

संभल ऐ राही, समय यही,
चमक नहीं पहचान है।
फिसलन भरे इस मार्ग पर,
हर कदम एक परीक्षा है।
जो लौटा निज सत्य तक,
वही हुआ निष्काम है।
आत्मदीप से आलोकित
जीवन ही अविराम है।
5 घंटे पहले
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