क्षितिज पर सांध्य-रेखा है,
नयन में तिमिर आया है;
मगर इस वृद्ध तरु पर फिर,
किरण ने घर बनाया है!
तुही आलोक-कण मेरा,
तुही विश्राम की छाया!
ललित जो चरण धरता है,
जगाता सुप्त पाषाणों;
लगाता वज्र-छाती से,
नया नव-प्राण का ताना!
पौरुषेय अंश जीवन का,
बना जो मौन था गाना!
चपल जो हँसी हँसती है,
झरें ज्यों पारिजात-कलियाँ;
सँभाले नेह का अंचल,
बुहारें हृदय की गलियाँ!
वेदनावंत इस उर की,
तुही करुणामयी कलियाँ!
चला जाता स्वयं जो काल,
इन्हें छू ठहर जाता है;
जगत का जीर्ण जो ढाँचा,
पुनः नव रूप पाता है!
पुत्र का पुत्र-पुत्री ही,
अमरता का विमल ताना!
झरे पत्ते समय-वश सब,
न रुका कोई प्रवाहों में;
मगर चेतन-सुधा बहती,
नई नसों की निगाहों में।
मरण केवल क्षयित तन है,
न जीवन की कहानी है;
शिशु के प्रथम स्पर्शों में,
पुनः जन्मी जवानी है।
विलीन होते स्वप्न सारे,
धुँधलाते जग के मेले;
रहे केवल नयन दो ही,
नवांकुर से सवेरे खेले।
अहं गलता हिमालय-सा,
स्नेह-सिन्धु में निरंतर;
समझ आता—
स्वयं ईश्वर
उतरता बाल-अंतर।
कहाँ खोता मनुज सचमुच?
कहाँ रुकती श्वास-ज्योति?
रुधिर बन बह रहा कोई,
अनागत की मधुर प्रीति।
वही स्पंदन, वही कम्पन,
वही आदिम प्रणय-धारा;
पुरातन वृक्ष की जड़ में
फिर उगा हरित उजियारा।
मिटे यह देह की माटी,
न इसकी सोच अब मन को;
सौंपता वृद्ध यह राही,
तुम्हें निज प्राण-स्पंदन को।
तुम्हारी मुग्ध आँखों में,
प्रभु का रूप मैंने पाया;
और इस क्षीण जीवन ने
अनश्वर सत्य को छाया।