मैंने देखा है—
जो पर्वत-सा दिखना चाहते हैं,
वे आकाश को नापते रहते हैं;
और जो वृक्ष बनते हैं,
वे चुपचाप धरती में
अपनी जड़ें गहरी करते हैं।
कभी स्वयं से पूछा था—
ऊँचा होना क्या है?
क्या सबकी दृष्टि में आ जाना,
या अपने भीतर उतरकर
उस मौन को सुनना,
जहाँ कोई घोषणा नहीं होती?
मैंने पाया—
ज्ञान का प्रकाश शोर नहीं करता।
वह संध्या के दीप-सा
धीरे-धीरे फैलता है;
और प्रकाशित कर देता है
उन कोनों को भी,
जहाँ अहंकार पहुँच नहीं पाता।
पर भीतर एक और स्वर था—
जो निरंतर अपने अस्तित्व का
प्रमाण माँगता रहा।
वह रिक्तता का स्वर था,
जो प्रतिध्वनियों को ही
सत्य समझ बैठा था।
तब जाना—
पूर्णता कभी ऊँची नहीं बोलती।
वह नदी की तरह बहती है,
मार्ग बनाती हुई,
पर स्वयं को मार्गदर्शक
घोषित नहीं करती।
जो झुकता है,
वह हारता नहीं;
वह अपने भीतर
एक व्यापक आकाश को स्थान देता है।
अभिमान का सिर उठता है,
पर दृष्टि संकुचित हो जाती है।
मैं आज भी सीख रहा हूँ—
फल से भरी डालियों का व्याकरण,
मिट्टी की विनम्र भाषा,
और उस प्रकाश का अर्थ
जो स्वयं को दिखाने के लिए नहीं,
दूसरों को देखने के लिए जलता है।
शायद महानता कोई शिखर नहीं,
एक साधना है—
जहाँ मनुष्य धीरे-धीरे
अपने ‘मैं’ का भार उतार देता है;
और तब, अनायास ही,
वह सबसे ऊँचा हो जाता है।