क्यों बाँध सकेगा स्नेह किसी को,
स्वर्णिम उपकारों के तंतु?
प्रेम न तो ऋण का लेखा है,
न मन का कोई अनुबंध।
मैंने देखा संध्या-पथ पर,
मुरझाए विश्वासों का वन;
जहाँ अपनापन बिकता था,
अहं के चाँदीले दर्पण।
जब-जब स्मृतियों की वीणा पर
उपकारों का स्वर बजता,
तब-तब घायल पंखों वाला
मन भीतर ही भीतर रोता।
प्रेम तो नभ का मुक्त विहंगम,
किसका उस पर अधिकार?
वह न झुकता राजदंड से,
न बिकता वैभव के द्वार।
कुछ जन स्नेह लुटाते ऐसे,
जैसे वरदान दे रहे हों;
और बदले में जीवन भर की
मौन निष्ठा ले रहे हों।
किन्तु आत्मा का श्वेत कमल
यह व्यापार नहीं सहता;
जहाँ सम्मान शरण माँगे,
वहाँ हृदय अधिक नहीं रहता।
मैंने सीखा—दूर चले जाना
हर बार विराग नहीं होता;
कभी स्वयं को बचा लेना भी
जीवन का अनुराग होता।
छाया बनकर रहे जो रिश्ता,
वही सच्चा मधुमय दान;
अहंकार जहाँ बीच खड़ा हो,
वहाँ झर जाता है सम्मान।
प्रेम रहे तो शीतल निर्झर,
मन को दे विस्तार;
उपकारों का भार बने तो
सूख जाए रिश्तों का संसार।