शास्त्रों ने जिसे रचा,
'धर्मपत्नी' नाम देकर,
वह केवल संगिनी नहीं,
कर्तव्य, कर्म और मोक्ष की,
सहयात्री है अनंत की।
पति का आधा अंग कह,
कहा गया 'अर्धांगिनी',
छोटा-बड़ा कोई नहीं,
दोनों मिलकर ही बने,
एक पूर्ण इकाई यहाँ।
जहाँ पुरुष शक्ति-संरक्षण,
वहाँ नारी संवेदना-सृजन,
एक यदि सुदृढ़ आधार है,
तो दूसरा उसका विस्तार है,
यही तो सुंदर संतुलन है।
पर आज प्रश्न खड़ा है,
इस बदलते परिवेश में,
क्यों संघर्षों के मोड़ पर,
मिलता नहीं आधा अधिकार,
और वह पूरा सम्मान?
पति को 'परमेश्वर' माना,
पर क्या वह बन पाया,
सुरक्षा और भावनाओं का,
एक सच्चा संरक्षक?
कहाँ चूक गया वह दायित्व से?
आज साथ रहने का चलन है,
पर साथ निभाने का अभाव है,
एक खोजता सदा समर्पण,
दूजी चाहती केवल सम्मान,
'मैं' के आगे 'हम' मौन है।
विवाह दो शरीरों का नहीं,
दो संस्कारों का मिलन है,
एक-दूसरे को बदलने में नहीं,
एक-दूसरे को समझने में ही,
इस रिश्ते का असली मर्म है।
यह जीवन-रथ के पहिए नहीं,
दो सजग सारथी हैं,
जहाँ प्रेम, समर्पण और धर्म हो,
वहाँ बंधन बंधन नहीं रहता,
एक पवित्र साधना बन जाता है।