मैं कोई सीमा नहीं,
जिसे रेखाएँ बाँध सकें।
मैं वह आकाश हूँ
जिसमें दिशाएँ
अपने नाम भूल जाती हैं।
मेरे भीतर
अग्नि भी जलती है,
और हिम भी पिघलता है।
यहीं प्रतिकार जन्म लेता है,
यहीं करुणा।
जब बुद्धि
अपना सूक्ष्म जाल बुनती है,
भीतर कोई बालक
अब भी पूछता है—
"क्या यही अंतिम सत्य है?"
मैंने जाना—
उत्तर समय के होते हैं,
प्रश्न अनंत के।
इसीलिए
जिज्ञासा कभी वृद्ध नहीं होती।
मैं नदी का वेग भी हूँ,
उसकी निस्तरंग गहराई भी।
भँवर और तट—
दो पृथक् अस्तित्व नहीं,
एक ही जल की स्मृतियाँ हैं।
जब जगत् पुकारता है,
मैं शब्द बनता हूँ।
जब आत्मा पुकारती है,
वही शब्द
मौन में लौट जाता है।
मौन रिक्त नहीं होता।
उसमें छिपे रहते हैं
वे सभी अर्थ
जिन्हें भाषा
छू नहीं पाती।
मेरी करुणा
कभी वज्र धारण करती है।
और मेरा वज्र भी
भीतर कहीं
एक कुसुम बचाए रखता है।
क्षमा और दण्ड—
दो धर्म नहीं।
बीज भी
अंकुर बनने से पहले
स्वयं को तोड़ता है।
मैं उतरता हूँ
संसार की असंख्य लहरों में।
नाम, संबंध, सफलताएँ—
सबको जीता हूँ,
सबको बहते देखता हूँ।
फिर एक दिन
सब लौट जाता है।
हथेलियों पर बचती है
केवल समय की धूल,
और एक शांत श्वास।
आसक्ति और विरक्ति—
दो किनारे नहीं।
एक ही श्वास का
आना और जाना हैं।
जीवन इन्हीं के बीच स्पंदित है।
अब जानता हूँ—
विरोध केवल
दृष्टि का भ्रम है।
अस्तित्व
समन्वय की निःशब्द लय है।
मैं प्रतिदिन
स्वयं से बाहर निकलता हूँ,
और प्रतिदिन
अपने ही भीतर
एक नया आकाश पाता हूँ।
मैं कोई निष्कर्ष नहीं,
एक अनवरत उद्घाटन हूँ।
जितना स्वयं को जानता हूँ,
उतना ही
अपने पार चला जाता हूँ।
मैं खोज भी हूँ,
खोजी भी—
और वह अनंत आकाश भी,
जहाँ प्रत्येक उत्तर
फिर एक नए प्रश्न में
बदल जाता है।
शायद
यही मेरा स्वरूप है।
यही—
अंतहीन आकाश।