नयनों में संचित सावन,
चुपके-चुपके बहता है।
हृदय-गुहा का मौन ज्वार
अश्रु बनकर कहता है।
मधुऋतु ने द्वार खटखटाया,
वन-उपवन मुस्काए थे;
किन्तु भीतर के निर्जन में
कुछ विरह-दहन छाए थे।
पूछ रही थी शिखा पवन से—
किसका स्मरण जलाता है?
क्यों मन अपने ही सपनों का
चुपचाप दाह कराता है?
पथ का ज्ञान वही पाए
जिसने धूलि सँवारी हो;
जीवन की दुर्गम घाटी में
पीड़ा भी सहचारी हो।
जब सब स्वर निष्प्राण हुए,
मौन अधिक मुखर हो जाता;
टूटे विश्वासों का बोझ
मन ही मन वह ढो जाता।
तब शब्दों के कोमल कण
दीपक बन उजियाते हैं;
अश्क और अंतर के अंगारे
कविता बन मुस्काते हैं।