अब तक देख लिया भला करके,
बुराई के सिवा भलाई भी नहीं मिली।
भला करते करते भी,
कुछ ना कुछ तो कमी रह ही जाती है,
उसको ढाल बनाकर,
मन माफिक खरी खोटी सुनने को मिली।
क्या फायदा हुआ ?
हम तो चले थे सहयोग करने,
एक दूसरे के बगैर काम भी नहीं चलता,
इस भावना से लग गए,
बस अब बहुत हो चुका,
अपना काम से काम फिर भी बदनाम,
ये तो किसी के काम ही नहीं आते,
फिर यह बात सुनने को मिली।
-चंद्र दत्त शर्मा