विज्ञापन

भाषा मृदु होती है

Omprakash Bajaj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भाषा मृदु होती है
        
                                                    
                            
उत्तर से आती लहरें , समाती दक्षिण सागर मे
संध्या के अर्पण तर्पण मे
वर्षा की एक बुंद, सीप मे
बन जाती मोती है ||भाषा ||
नदियों की कलकल ध्वनि,
बाणी में मिश्री सी घुल जाती है ||भाषा ||
हवा विहंगम , बाज़े छमछम,
इक मीठी धुन बन जाती है ||भाषा ||
साहस भर देती है भाषा
भाषा अति बेजोड़ , शीष्ट होती है ||भाषा ||
पल पल न्यारे नए कलेवर - शब्दो मे झांकते तेवर,
मस्तक पर बरसाती मेहर
झुम रहे शब्दों के जेवर, मात्राएं घुघरू पिरोती है ||भाषा ||
जननी है , मत शोषण करना
पोषण करना , तन से मन से, ह्रदयस्थल से ||भाषा||
2 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

RATAN KUMAR

613 कविताएं

View Profile

Rajiv Tyagi

423 कविताएं

View Profile

Anil Kumar

4215 कविताएं

View Profile