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मेरा आत्मसम्मान

Nutan sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उसने हर बार तोड़ा मैंने हर बार जोड़ा।
        
                                                    
                            
न जाने कब से कहानी ये चलती रही।
में अपने आत्मसम्मान के लिए मैं हर बार लड़ती रही।
द्रोपदी मैं, बड़े गर्व से पांच पतियों की पत्नी और एक राज्य की राजुमारी रही।
पर अपना आत्मसम्मान खुद न बचा सकी ।
अपना स्वाभिमान बचाने के लिए वासुदेव को ही बुलाती रही।
में अपने आत्मसम्मान के लिए मैं हर बार लड़ती रही।

गिरिधर की बावरी मैं, मीरा रही।
मेरी गोपाल से लगन भी सबको चुभती रही।
विष का प्याला वो देकर सुलाने चले।
अपना स्वाभिमान बचाने में गिरिधर को ही बुलाती रही।
में अपने आत्मसम्मान के लिए मैं हर बार लड़ती रही।

जनक नंदिनी मैं मर्यादा पुरुषोत्तम की संगिनी,रही।
फिर भी हर बार अग्निपरीक्षा देती रही।
अपना स्वाभिमान बचाने में धरती मां को बुलाती रही।
में अपने आत्मसम्मान के लिए मैं हर बार लड़ती रही।

हर बार कभी राधा, कभी पद्मावती, बनके परीक्षा देती रही।
न तो उस युग में कुछ बदला न इस युग में बदला।
कल भी और आज भी,बस अपना स्वाभिमान बचाती रही।
में अपने आत्मसम्मान के लिए मैं हर बार लड़ती रही।

हां मैं अब तक हर बार खामोश ही रही।
परंतु अब समय चुपचाप सब सहने का है नहीं।
ठेस लगे अगर आत्मसम्मान पर तो चुप क्यूं रहूं खड़ी।
क्योंकि मैं खुद मेरा स्वाभिमान हूं।
भूल गई थी ये, कि मैं तो हमेशा से ही स्वाभिमान से भरी रही।
में अपने आत्मसम्मान के लिए मैं हर बार लड़ती रही।

नूतन शर्मा
4 वर्ष पहले
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