आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मेरा आत्मसम्मान

                
                                                         
                            उसने हर बार तोड़ा मैंने हर बार जोड़ा।
                                                                 
                            
न जाने कब से कहानी ये चलती रही।
में अपने आत्मसम्मान के लिए मैं हर बार लड़ती रही।
द्रोपदी मैं, बड़े गर्व से पांच पतियों की पत्नी और एक राज्य की राजुमारी रही।
पर अपना आत्मसम्मान खुद न बचा सकी ।
अपना स्वाभिमान बचाने के लिए वासुदेव को ही बुलाती रही।
में अपने आत्मसम्मान के लिए मैं हर बार लड़ती रही।

गिरिधर की बावरी मैं, मीरा रही।
मेरी गोपाल से लगन भी सबको चुभती रही।
विष का प्याला वो देकर सुलाने चले।
अपना स्वाभिमान बचाने में गिरिधर को ही बुलाती रही।
में अपने आत्मसम्मान के लिए मैं हर बार लड़ती रही।

जनक नंदिनी मैं मर्यादा पुरुषोत्तम की संगिनी,रही।
फिर भी हर बार अग्निपरीक्षा देती रही।
अपना स्वाभिमान बचाने में धरती मां को बुलाती रही।
में अपने आत्मसम्मान के लिए मैं हर बार लड़ती रही।

हर बार कभी राधा, कभी पद्मावती, बनके परीक्षा देती रही।
न तो उस युग में कुछ बदला न इस युग में बदला।
कल भी और आज भी,बस अपना स्वाभिमान बचाती रही।
में अपने आत्मसम्मान के लिए मैं हर बार लड़ती रही।

हां मैं अब तक हर बार खामोश ही रही।
परंतु अब समय चुपचाप सब सहने का है नहीं।
ठेस लगे अगर आत्मसम्मान पर तो चुप क्यूं रहूं खड़ी।
क्योंकि मैं खुद मेरा स्वाभिमान हूं।
भूल गई थी ये, कि मैं तो हमेशा से ही स्वाभिमान से भरी रही।
में अपने आत्मसम्मान के लिए मैं हर बार लड़ती रही।

नूतन शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर