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आत्म-विश्वास और संघर्ष

Nishant Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब स्वयं पर संदेह हो,
        
                                                    
                            
थकी तुम्हारी देह हो,
न मिला कहीं स्नेह हो,
जब सुख-दुःख के झूले पर नित डोल रहा हो अंतर्मन ,
जब लगा दांव पर हो तन, मन, जीवन और धन।
कुछ भी हो पर ये न भूलो,
है चांद अगर तो है सूरज भी,
है पश्च अगर तो है अग्रज भी,
है रात अगर तो है भोर की वेला,
करता संघर्ष तू नहीं अकेला।
माना कि है देर हुई, पर आशा भी तो कुछ होती है,
घोर निराशा फिर लक्ष्य की आशा भी तो कुछ होती है।
इसलिए, उठो तुम प्रयास करो,
मन में अपने विश्वास धरो ।
7 घंटे पहले
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Updesh Kumar

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