जब स्वयं पर संदेह हो,
थकी तुम्हारी देह हो,
न मिला कहीं स्नेह हो,
जब सुख-दुःख के झूले पर नित डोल रहा हो अंतर्मन ,
जब लगा दांव पर हो तन, मन, जीवन और धन।
कुछ भी हो पर ये न भूलो,
है चांद अगर तो है सूरज भी,
है पश्च अगर तो है अग्रज भी,
है रात अगर तो है भोर की वेला,
करता संघर्ष तू नहीं अकेला।
माना कि है देर हुई, पर आशा भी तो कुछ होती है,
घोर निराशा फिर लक्ष्य की आशा भी तो कुछ होती है।
इसलिए, उठो तुम प्रयास करो,
मन में अपने विश्वास धरो ।
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