माटी का दीया
माटी का दीया हूँ, माटी का दीया,
मेरे विगत पल का तुम्हें क्या पता।
रौंदा जाता हूँ मैं पैरों से बार-बार,
अंगारों में तपाया गया सुकुमार।
आँधी और तूफ़ान से लड़ता हूँ बार-बार,
खुश होती है दुनिया मैं जब भी जला।
पूजा-अर्चन की थाली में मैं सजा,
कभी दीप देहरी का बनकर जला।
तिमिर को भगाकर करना है उजास,
दीपों की अवलि खुशियों का त्योहार।
वर्तिका मन की हौले-हौले जला
अवनि-अंबर में होता हूँ प्रदीप्तमान।
-निशा भास्कर