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तिमिर को भगाकर करना है उजास, दीपों की अवलि खुशियों का त्योहार।

                
                                                         
                            माटी का दीया
                                                                 
                            

माटी का दीया हूँ, माटी का दीया,
मेरे विगत पल का तुम्हें क्या पता।

रौंदा जाता हूँ मैं पैरों से बार-बार,
अंगारों में तपाया गया सुकुमार।

आँधी और तूफ़ान से लड़ता हूँ बार-बार,
खुश होती है दुनिया मैं जब भी जला।

पूजा-अर्चन की थाली में मैं सजा,
कभी दीप देहरी का बनकर जला।

तिमिर को भगाकर करना है उजास,
दीपों की अवलि खुशियों का त्योहार।

वर्तिका मन की हौले-हौले जला
अवनि-अंबर में होता हूँ प्रदीप्तमान।
-निशा भास्कर
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21 घंटे पहले

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