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एक बार उठकर बाहों में लपेट लो ना पापा

Neha Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक बार उठकर बाहों में लपेट लो ना पापा,
        
                                                    
                            
सारा संघर्ष मेरे सीने में समेट दो ना पापा,
आपने तो आख़िरी साँस तक ये छिपाया पापा,
मेरे तो जन्म से पहले ही शुरू हुआ ये संघर्ष था पापा,
माँ का ख्याल रख मुझे कोख में भी स्वस्थ रखा,
पर मैंने तो पहला लफ्ज़ भी माँ ही सीखा,
उस पल भी आपने बड़े जश्न मनाए,
मेरे वाकर की खातिर टैक्सी के पैसे बचाए,
हर त्योहार माँ को मुझे नए कपड़े दिलाए,
आपने तो दिवाली तक नए कपड़े ना सिलाये,
मुझे तो अच्छे से अच्छे स्कूल में पढ़ाया,
महंगी फीस का दर्द छिपा सदा हौंसला बढ़ाया,
हर साल अपना जन्मदिन जिद कर मनवाया
कैसा संघर्ष था पापा कभी चिडकर ना बताया,
ऊंची शिक्षा के लिए मैंने विदेश जाना चाहा,
दफ्तर से कर्ज लेने में आपका जी जरा ना हिचकिचाया,
एक हाथ डिग्री एक हाथ नौकरी का जब ऑफ़र लेके आया,
पीठ थपथपाते ना थके सर बड़ा ऊंचा पाया,
बहुत धूमधाम से माथे पर मेरे सेहरा सजाया,
कुछ दिनों बाद सदमा गहरा लगाया,
बिना सोचे कह दिया मैं नए घर में जाऊँगा,
छोटे घर में जी घबराता है अब साथ ना रह पाऊंगा,
मेरी खुशी की खातिर आपने जुदाई की हामी भर दी,
माँ तो चली गयी थी मैंने भी जा एकांत से झोली भर दी,
किसी भी समारोह में मुझे देख बड़ा हर्ष करते,
घर आ अपनी भावनाओं से फिर वही संघर्ष करते,
भूल हुई थी मुझसे जो पिता की भावनाओं को ना समझ पाया,
दर्द तब लगा जब गोद में जन्मी अपनी मर्त औलाद को पाया,
दौड़ा दौड़ा पहुंचा पापा के पास जब होश आया,
पर जैसे आज थे ऐसे कभी उन्हे ना खामोश पाया,
एक बार उठकर बाहों में लपेट लो ना पापा,
सारा संघर्ष मेरे सीने में समेट दो ना पापा

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले
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