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हाथ से निकलते ख्वाब

neetu Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बाली उम्र में ज़िम्मेदारी ने,चेहरा बिगाड़ दिया
        
                                                    
                            
सुंदरता ने समय से पहले,पल्ला झाड़ लिया
ये चिपकी हुई आँखे सिकुड़ता हुआ चेहरा
कुछ गरीबी ने मारा तो कुछ,भूख ने मार दिया

गरीबी से उबर तो लूं लेकिन,मर्ज़ आ जाता है
जरा नए कपड़े किया पहनूं,कर्ज आ जाता है
ये रिश्तों की डोर भी ना पतंग के समान है
जो मोहब्बत मागों तो फर्ज,आ जाता है

इस आर्थिक स्थिति में सब कुछ,रूठ गया
अरमानो का गुलदस्ता पता नहीं,कब टूट गया
किसने देखा पुनर्जन्म ये दिल को बहलाना है
कोई जाने वाला ना आएगा,छूट गया सो छूट गया

नीटू मावी
2 महीने पहले
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