आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हाथ से निकलते ख्वाब

                
                                                         
                            बाली उम्र में ज़िम्मेदारी ने,चेहरा बिगाड़ दिया
                                                                 
                            
सुंदरता ने समय से पहले,पल्ला झाड़ लिया
ये चिपकी हुई आँखे सिकुड़ता हुआ चेहरा
कुछ गरीबी ने मारा तो कुछ,भूख ने मार दिया

गरीबी से उबर तो लूं लेकिन,मर्ज़ आ जाता है
जरा नए कपड़े किया पहनूं,कर्ज आ जाता है
ये रिश्तों की डोर भी ना पतंग के समान है
जो मोहब्बत मागों तो फर्ज,आ जाता है

इस आर्थिक स्थिति में सब कुछ,रूठ गया
अरमानो का गुलदस्ता पता नहीं,कब टूट गया
किसने देखा पुनर्जन्म ये दिल को बहलाना है
कोई जाने वाला ना आएगा,छूट गया सो छूट गया

नीटू मावी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
16 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर