तुम्हारी जुबां या मेरी खामोशियाँ बोल रही हैं।
किस बेड़ी से जकडे हो,पाबंदियाँ बोल रही हैं।
तेल कल सारी रात जला रोशनी की ज़ुबाँ में,
दीये का वजूद सुर्ख़ रूह बातियाँ बोल रही हैं।
फ़ाक़ों की आग से बुझाता रहा पेट की आग,
उसकी तपिश ये जली हुई रोटियां बोल रही हैं।
अल्फ़ाज़ ढूँढ रहे है अपना मफ़हूम गालियों में,
अब सियासत से ज्यादा गालियां बोल रही है।
यहां दिलों को फासलों से रखना क्या बुरा है,
अर्सा हुआ मुझे अपना दिल स्याह किये हुये ,
दिल नही आजकल दिल्लगियां बोल रही है।
फ़ाक़ों की आग से बुझाता रहा पेट की आग,
उसकी तपिश ये जली सी रोटियां बोल रही हैं।
-जयंत दिक्षित