क्या अखबार की कतरन है देश।
मुद्दा ये है कि मुद्दा क्यों है ज्ञानेश।
सैंतालीस मे ख्वाब बांट दिये थे,
छब्बीस आते ,बांट रहे है उपदेश।
मतपेटियों ने जिया हैवो दौर भी,
जब लुट का रहा शाश्वत परिवेश।
सामाजिक न्याय होना अच्छा है,
सामाजिक अन्याय के भी क्लेश।
दो तरह के शहंशाह ए मुल्क यहां,
एक तो रंक ,दूसरे पैदायशी नरेश।
-जयंत दिक्षित