इस ज़माने के सितम का जब कहर उस पर हुआ,
रफ़्ता-रफ़्ता दिल भी उसका मोम से पत्थर हुआ।
हम करें तुझ पर भरोसा क्यों भला और किसलिए,
ये बता तुझको भरोसा आज तक किस पर हुआ।
मत देखो उसकी तरफ इतनी नफ़रत से जनाब,
वो मुहब्बत का है दरिया, जो भी डूबा तर हुआ।
देखिए इस दौर ने तोड़ा है हर विश्वास को,
आबरू लुटने का बेटी को, पिता से डर हुआ।
मेरे भाई को पिता ने हाथ में पत्थर दिए,
और बँटवारे में मेरा काँच का यह घर हुआ।
गर उठाया सर किसी ने उसके ज़ुल्मों के ख़िलाफ़,
धड़ से समझो दूसरे दिन को अलग फिर सर हुआ।