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प्यासे को कुआं

Nathuram Kaswan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हो जिस नज़र से सबका भला, ग़लत उसका नज़रिया कैसे हो सकता है!
        
                                                    
                            
जिस के तट से मुसाफ़िर लौट आए प्यासे, वोह दरिया कैसे हो सकता है!

प्यासे की मंज़िले-मक़्सूद कुएं के अलावा औरकुछ हरगिज़ हो नहीं सकती
मुसाफ़िरत उम्रे-तमाम इक सहरा की जीने का ज़रिया कैसे हो सकता है!
-एन. आर. कस्वाँ
3 घंटे पहले
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