हो जिस नज़र से सबका भला, ग़लत उसका नज़रिया कैसे हो सकता है!
जिस के तट से मुसाफ़िर लौट आए प्यासे, वोह दरिया कैसे हो सकता है!
प्यासे की मंज़िले-मक़्सूद कुएं के अलावा औरकुछ हरगिज़ हो नहीं सकती
मुसाफ़िरत उम्रे-तमाम इक सहरा की जीने का ज़रिया कैसे हो सकता है!
-एन. आर. कस्वाँ
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X