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उम्रभर आंखे तर थी

Nandkumar Bhagwat

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            न उनको हमारी खबर थी शायद न हमको उनकी खबर थी
        
                                                    
                            
अब तो बस उन की चंद यादें ही अपने सासों की रहबर थी

ज़िंदगी की इस डगर में सुरते भी कैसी कैसी नजर आई
समय के धुल में खो सी गई सारी मगर एक तो कहर थी

तनहाईयों में जीना ही नसीब बन गया हैं अब तो शायद
सुकूँ बस इतना था कि साथ मेरे एक किसी की नज़र थी

दिल को हुई हैं आदत हर दर्द अब मुस्कुराकर सहने की
दर्द जितना भी मिला उस से ही पाई हमने थोड़ी हुनर थी

न कोई अपना यहां स्थायी होता है न कोई पराया हमेशा
ये दुनिया एक पड़ाव थी और रूह अपनी एक मुसाफ़िर थी

दिल की धड़कनों ने पुकारा था उन को जाने कितनी बार
मगर उनकी खामोशी ही शायद अपने नसीब में अक्सर थी

जाने कितनी राते जागते रहे उस चाँद की चांदनी के लिए
सुबह होती तो लगता था कि ये दिल की एक इबादत भर थी

कभी मिलो तो झूठ ही सही मगर जरा मुस्कुरा भर देना
बहाना मिलेगा कोई हंसने को वरना उम्र भर आंखे तर थी
-नंदकुमार भागवत
3 महीने पहले
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