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हर बात ( युद्ध काव्य )

Nandkumar Bhagwat

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर बात उसी एक मोड पर हीं जाकर पहुंचती हैं
        
                                                    
                            
न हम तैयार पीछे हटने को और न वो आगे बढ़ती हैं !

मेरी नजर हैं उन पर उनकी भी नजरे लगी हैं हम पर
खेल हमारा ये नज़रों का दुनिया की धड़कने बढ़ती हैं

न उनको पता हैं आगे क्या होगा हम भी हैं इससे बेखबर
आंख मिचौली के इस खेल में जिंदगी की रंगत बढ़ती हैं

वादा था उनका हम से मिलने का हम राह ही देखते रहे
न वो आए न उनका पैगाम आया यूं तो दूरियां ही बढ़ती हैं

नाराजगी से आखिरकार वो आ ही गए मुलाकात को
उन्हें समझाते समझाते हम भी थके अब बेचैनी बढ़ती हैं

वो कहें यकीं कैसे हो उस पर जिसने सिर्फ दर्द ही दिया हैं
बिना सोचें ऐसे इल्ज़ाम लगाने से परेशानियां ही बढ़ती हैं
-नंदकुमार भागवत
3 महीने पहले
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