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विभीषिका

NAND KISHOR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हुई ना समझ गलती एक
        
                                                    
                            
बंटवारा हो गया
नीर सिंधु का दो मुल्कों में
बह गया
आंगन एक जिसमें बचपन
खेल बीता
जवानी में दीवार ने एक
लगा दिया फीता
ना भगत की चाह ना आजाद
की आजादी
चंद लोगों ने बांट दी चुनर
आधी आधी
जिसे देख हिमालय भी
फूट फूट रोया
कोख में मां के बच्चा भी
खूब रोया
सत्ता के मद में मदहोश
लोगों ने
लक्ष्मी सा साहस दिखाया
होता
सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां
हमारा
आखिर ऐसे तो नहीं
टूटता
देकर धोखा पीठ पीछे
ज़ख्म गहरा किया
लहु अपने ही लोगों का
नीर सा बहा दिया
आजादी का सूरज
मातम में डूबा
मजहब के खेल में
अपनों ने लूटा
एक महीने पहले
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