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विभीषिका

                
                                                         
                            हुई ना समझ गलती एक
                                                                 
                            
बंटवारा हो गया
नीर सिंधु का दो मुल्कों में
बह गया
आंगन एक जिसमें बचपन
खेल बीता
जवानी में दीवार ने एक
लगा दिया फीता
ना भगत की चाह ना आजाद
की आजादी
चंद लोगों ने बांट दी चुनर
आधी आधी
जिसे देख हिमालय भी
फूट फूट रोया
कोख में मां के बच्चा भी
खूब रोया
सत्ता के मद में मदहोश
लोगों ने
लक्ष्मी सा साहस दिखाया
होता
सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां
हमारा
आखिर ऐसे तो नहीं
टूटता
देकर धोखा पीठ पीछे
ज़ख्म गहरा किया
लहु अपने ही लोगों का
नीर सा बहा दिया
आजादी का सूरज
मातम में डूबा
मजहब के खेल में
अपनों ने लूटा
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10 घंटे पहले

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