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विमुख धर्म से होता जब भी

NAND KISHOR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अलबेली ये जीवन धारा
        
                                                    
                            
मन पापी है तन प्यारा
स्वर्णमयी लंका के पाछें
ठूंठ मिटाया अपना सारा

पीता देखो विष का प्याला
डाल गले में कंठी माला
ढोंग रचाए श्रेष्ठ बताए
इनका ही है बोल बाला

मैं अजर अविनाशी हूं
जीव जगत का स्वामी हूं
दूर करूंगा विपदा सारी
माया का भंडारी हूं

पाप पुण्य की नाव सवारी
इक दूजे पर होती भारी
बीच भंवर में गोते खाती
कौन लगाए पार हमारी

मैं बड़ा तुम छोटे हो
गुण से लगते खोटे हो
खेल खेलता जैसे मानव
इसमें ही तो मरते हो

मन में पाला मैल जरा भी
लिए तराजू तौला तो भी
ईश कहां फिर पाएगा
विमुख धर्म से होता जब भी

हरा भरा परिवार सभी का
नित होता सम्मान बड़ों का
रिश्तों में मर्यादा दर्शन
करे विश्व गुणगान इन्हीं का
12 घंटे पहले
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