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विमुख धर्म से होता जब भी

                
                                                         
                            अलबेली ये जीवन धारा
                                                                 
                            
मन पापी है तन प्यारा
स्वर्णमयी लंका के पाछें
ठूंठ मिटाया अपना सारा

पीता देखो विष का प्याला
डाल गले में कंठी माला
ढोंग रचाए श्रेष्ठ बताए
इनका ही है बोल बाला

मैं अजर अविनाशी हूं
जीव जगत का स्वामी हूं
दूर करूंगा विपदा सारी
माया का भंडारी हूं

पाप पुण्य की नाव सवारी
इक दूजे पर होती भारी
बीच भंवर में गोते खाती
कौन लगाए पार हमारी

मैं बड़ा तुम छोटे हो
गुण से लगते खोटे हो
खेल खेलता जैसे मानव
इसमें ही तो मरते हो

मन में पाला मैल जरा भी
लिए तराजू तौला तो भी
ईश कहां फिर पाएगा
विमुख धर्म से होता जब भी

हरा भरा परिवार सभी का
नित होता सम्मान बड़ों का
रिश्तों में मर्यादा दर्शन
करे विश्व गुणगान इन्हीं का
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एक घंटा पहले

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