आँसू अब ख़र्च हो गए हैं,
हाँ, हम अब कुछ कठोर हो गए हैं।
वो हम ही थे,
जो शीशे-सा दिल लिए फिरते थे,
अब वही दिल टूट चुका है,
और हम पत्थर के हो चुके हैं।
कुछ टीसें हैं,
जो मन को भीतर तक लहूलुहान करती हैं,
कुछ ख़ामोशियाँ हैं,
जो हर रोज़ थोड़ा और मारती हैं।
यह वही क़ीमत है,
जो हमने चुकाई है—
किसी के साथ की चाह में,
किसी की हमनवाँई की चाह में।
प्रेम अब बस परिभाषा-मात्र है,
एक शब्द, जिसे किताबों में सहेजा गया है;
ज़िंदगी में तो उसे
बार-बार नकारा गया,
ठुकराया गया,
छोड़ा गया—
और अंततः…
मार दिया गया।
हाँ, प्रेम मरा है।
किसी एक दिन नहीं,
एक ही वार में नहीं—
वह हर बार थोड़ा-थोड़ा मरा,
जब उसे चाहने वाले ने ही
चाहे जाने से इनकार कर दिया।