आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

थोड़ा-थोड़ा मरता प्रेम

                
                                                         
                            आँसू अब ख़र्च हो गए हैं,
                                                                 
                            
हाँ, हम अब कुछ कठोर हो गए हैं।
वो हम ही थे,
जो शीशे-सा दिल लिए फिरते थे,
अब वही दिल टूट चुका है,
और हम पत्थर के हो चुके हैं।
कुछ टीसें हैं,
जो मन को भीतर तक लहूलुहान करती हैं,
कुछ ख़ामोशियाँ हैं,
जो हर रोज़ थोड़ा और मारती हैं।
यह वही क़ीमत है,
जो हमने चुकाई है—
किसी के साथ की चाह में,
किसी की हमनवाँई की चाह में।
प्रेम अब बस परिभाषा-मात्र है,
एक शब्द, जिसे किताबों में सहेजा गया है;
ज़िंदगी में तो उसे
बार-बार नकारा गया,
ठुकराया गया,
छोड़ा गया—
और अंततः…
मार दिया गया।
हाँ, प्रेम मरा है।
किसी एक दिन नहीं,
एक ही वार में नहीं—
वह हर बार थोड़ा-थोड़ा मरा,
जब उसे चाहने वाले ने ही
चाहे जाने से इनकार कर दिया।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
36 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर