गांव हो शहर गर्मी में पानी को कमी
लोगों को बहुत सताती है
पहले हर गांवों दो-तीन तालाब होते ही थे
एक पीने के लिए एक तालाब
दूसरा सिर्फ नहाने होता था
तीसरा तालाब कपड़ा धोने
और निकासी होता था
उस जमाने में जमींदार अथवा समृद्ध किसान
एक कुआं मंदिर अथवा सार्वजनिक
गांव में होता ही था
पर वह व्यवस्था समाप्त हो चुकी है
पुराने जमाने में कस्बों, राजा की राजधानी मे
बहुत तालाब और कुएं खोदे जाते थे
पर वो व्यवस्था समाप्त हो चुकी है
अब कल-कारखाने बहुत बढ़ गयें हैं
जल स्त्रोतों का भरपूर दोहन हो रहा है
नदियों और भूमिगत जल स्त्रोतों को
पूर्णतः बड़े-बड़े कारखानों और
सिचाई के लिए बांध बनाने में हो रहा है
शहरों में कारखानों और गंदे पानी निकासी
नदियों मे हो रहा है
नदियों के पानी पीने योग्य न रहीं
गांव-शहरों में तालाब पर ध्यान नहीं दिया गया
इन स्त्रोतों का कोई ऊपयोग ही नहीं रहीं
भूमिगत स्त्रोत का जलस्तर पाताल की ओर जा रहा है
सावधान! यह यह जल समस्या
एक आत्मघातक है
प्राणघातक है
जल समृद्धि आवश्यक है
- भागवत प्रसाद नायक