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छलका दर्द

Naik prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इश्क की बिमारी अब पुरानी हो चुकी है
        
                                                    
                            
विछोह का दर्द भी अब पुरानी हो चुकी है।
प्रेमिका बहुत पहले किसी का रानी हो चुकी है
जख्म की टीस जब कभी उठती है
शरीर पशीने से तर-बतर हो उठती है
दोनो आंखो से आंसू अविरल बहने लगती है
जख्म पुरानी हो तो दर्द छलकने लगती है
शुरुवात में गम मिटाने लिए दो पेग जाम लिए
जाम के शरुर मे गम भूल जाया करता था
नशा उतरने के जिन्दगी बेजार होने लगी
मदहोश करने वाली मय दुगुना होने लगी
कुछ महिनों बाद
डाक्टर बतया दिल कि छलनी होने लगी है
अब तो हमें कभी होश कभी रहता नहीं है
अब तो जीने की भी तमन्ना तो छोड़ दी है
पर दर्द कितना छलके
उनसे मिलने की आस नहीं छोड़ी है
एक महीने पहले
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