मेरे अपने बचपन में खेलें हैं।
आंखों में हम सब के सपने हैं।
न अपने न सपने बस बंटवारे हैं।
हां नीरज मेरे अपने विचार हैं।
शब्दों में मेरे अपने भी होते हैं।
रिश्ते नाते मेरे अपने कहां हैं।
शायद धन संपत्ति मेरे अपने हैं।
छल फरेब स्वार्थ मेरे अपने हैं।
पराएं मेरे अपने बस सपने हैं।
माता पिता भी पक्षपात करते हैं।
सच कड़वा बहु बेटे न मेरे अपने हैं।
दाह संस्कार बहु बेटे ही करते हैं।
जवां पोते की मृत्यु भूला लेते हैं।
बस यही मेरे अपने हंसते रहते हैं।
हम अकेले ही छिपकर रो लेते हैं।
मेरे अपने ही तो अकेले रास्ते हैं।
सच जंग मेरे अपने ही लड़ते हैं।
एक सच मेरे अपने ही घर हैं।
आओ आज में हम तुम जीते हैं।
-नीरज कुमार अग्रवाल