आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शीर्षक - मेरे अपने..... बटबांरे

                
                                                         
                            मेरे अपने बचपन में खेलें हैं।
                                                                 
                            
आंखों में हम सब के सपने हैं।
न अपने न सपने बस बंटवारे हैं।
हां नीरज मेरे अपने विचार हैं।
शब्दों में मेरे अपने भी होते हैं।
रिश्ते नाते मेरे अपने कहां हैं।
शायद धन संपत्ति मेरे अपने हैं।
छल फरेब स्वार्थ मेरे अपने हैं।
पराएं मेरे अपने बस सपने हैं।
माता पिता भी पक्षपात करते हैं।
सच कड़वा बहु बेटे न मेरे अपने हैं।
दाह संस्कार बहु बेटे ही करते हैं।
जवां पोते की मृत्यु भूला लेते हैं।
बस यही मेरे अपने हंसते रहते हैं।
हम अकेले ही छिपकर रो लेते हैं।
मेरे अपने ही तो अकेले रास्ते हैं।
सच जंग मेरे अपने ही लड़ते हैं।
एक सच मेरे अपने ही घर हैं।
आओ आज में हम तुम जीते हैं।
-नीरज कुमार अग्रवाल 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर