विज्ञापन

ग़ज़ल

Muskan Kumari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मुफ़लिसी की बात मत पूछो
        
                                                    
                            
मुफ़लिस से बात मत पूछो

गुजर रहे हैं अभावों में दिन
खाली पेट दिल की बात मत पूछो

तन्हाई में रोने लगा है मन
सामने ख़ुशी की बात मत पूछो ।

मुफ़लिसी में कैसे गुजरे दिन
सुबह-सुबह हंस कर बात मत पूछो ।

दो वक्त रोटी को तरसते हैं रोजाना
नसीब बदलने की बात मत पूछो ।

हाले दिल ब्यां 'चांदनी' क्या करें
मुफ़लिसी में बीते दिन कि बात मत पूछो ।


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7573 कविताएं

View Profile