महँगाई ने ऐसा कहर बरपाया है,
हर घर में चिंता का बादल छाया है।
चूल्हे की आग भी अब सवाल करती है,
रोटी हर दिन नई कीमत माँगती है।
दालों के दाम आसमान छू रहे हैं,
गरीब के सपने दम तोड़ रहे हैं।
तेल, सब्ज़ी, आटा सब महँगे हुए,
मजबूरियों के आँसू आँखों में रुके।
जेब में सिक्के, बाज़ार में आग,
कैसे चलेगा जीवन का राग?
बच्चों की ख़्वाहिशें ख़ामोश हो गईं,
माँ की उम्मीदें भी कमज़ोर हो गईं।
पिता की मेहनत का क्या मोल रहा,
तनख़्वाह से पहले राशन ख़त्म हो रहा।
हर महीने हिसाब लगाते हैं लोग,
फिर भी न मिटता है भूख का रोग।
न त्योहारों में पहले-सी रौनक रही,
न चेहरों पर खुशियों की चमक रही।
महँगाई ने छीन लिया सुकून का संसार,
आम आदमी सह रहा है पीड़ा अपार।
**कब तक गरीब यूँ ही आँसू पिएगा,
कब तक महँगाई का बोझ लिएगा?
रोटी, कपड़ा, मकान हो सबकी पहुँच में,
इंसानियत ज़िंदा रहे महँगाई के शिकंजे में नहीं,
बल्कि हर इंसान के सम्मान और हक़ के पक्ष में।**
— मुनीर शमी