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जब भी तुझे लिखूंगा

Mukesh kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब भी तेरे बारे में कोई किताब लिखूंगा,
        
                                                    
                            
तेरे होंठों को महकता गुलाब लिखूंगा।

तेरी आँखों की मदहोशी का ज़िक्र जब आएगा,
मैं उन्हें दुनिया की सबसे हसीं शराब लिखूंगा।

लिखूंगा तुझे रानी उन परियों के जहाँ की,
और तेरे इश्क़ में खुद को नवाब लिखूंगा।

जहाँ भी सलीका सिखाया जाएगा मोहब्बत का,
तेरे हर अंदाज़ को मैं आदाब लिखूंगा।

तेरी हँसी को सुबह की पहली किरण,
तेरी आवाज़ को कोई मीठा राग लिखूंगा।

तेरी ज़ुल्फ़ों का ज़िक्र आएगा जब रातों में,
मैं उन्हें चाँद पर छाया हुआ ख़्वाब लिखूंगा।

और जब कभी सवाल होगा—
“जन्नत आखिर होती कैसी है?”
मैं बिना कुछ सोचे,
तेरी बाँहों को उसका जवाब लिखूंगा।
— मुकेश कुमार वर्मा ‘बाग़ी’
एक घंटा पहले
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