मैं तुम्हें जाने देने और तुम्हारी प्रतीक्षा करने के बीच अटका हुआ हूँ
क्योंकि यदि मैं चला जाऊँ,
तो हमारे साथ होने की
संभावना खो दूँगा।
लेकिन यदि मैं ठहरूँ,
तो तुम्हें प्रेम करता रहूँगा
मौन के बीच,
दूरियों के बीच,
और उन अनगिनत
‘लगभग’ के बीच।
और मुझे नहीं पता
कि इनमें से अधिक पीड़ादायक क्या होगा
तुम्हें खो देना,
या किसी ऐसे व्यक्ति की
प्रतीक्षा करते रहना,
जो शायद
कभी मुझे चुने ही नहीं।
शायद इसलिए
मैं कोई निर्णय नहीं करूँगा।
तुम्हारे आने की
संभावना को भी रखूँगा,
और तुम्हारे न आने की
सच्चाई को भी।
तुम्हारे नाम की जगह
किसी और का नाम नहीं रखूँगा,
लेकिन तुम्हारे लिए
अपना पूरा जीवन भी
रोककर नहीं रखूँगा।
मैं बस
अपने दिनों को चलता रहने दूँगा
जैसे नदी चलती है,
यह जाने बिना
कि अगला किनारा
उसे मिलेगा भी या नहीं।
और यदि कभी
तुम लौटकर आओगी,
तो शायद
मैं तुम्हें यह नहीं बताऊँगा
कि मैंने कितनी प्रतीक्षा की थी।
मैंने तुम्हें पाने के लिए
प्रतीक्षा नहीं की होगी,
मैंने तो बस
उस संभावना को
थोड़ा और समय दिया होगा
जिसमें
हम कभी
एक-दूसरे को चुन सकते थे।
शायद प्रेम का सबसे कठिन रूप
यही होता है
किसी को रोकना नहीं,
किसी और को ढूँढ़ना नहीं.